ब्रजस्थ मैथिल ब्राह्मण सभा मथुरा Brajastha Maithil Brahman Sabha

मुक्तक: शरद पूर्णिमा आश्विनी पूर्णिमा

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मुक्तक

शरद पूर्णिमा आश्विनी पूर्णिमा 

 शारदी पूर्णिमा चन्द्र आया निकल|
 चाँदनी खिल रही है धवल ही धवल|
 हम सन्देश समझें प्रकृति का "सरस",
 हर मानव का मन हो विमल ही विमल|| 

है सुधामयि मन भावनी पूर्णिमा|
उज्ज्वला - उज्ज्वला पावनी पूर्णिमा|
समशीतोष्ण बातावरण कर रही,
शारदी पूर्णिमा - आश्विनी पूर्णिमा||

चाँदनी स्वच्छ घरटी सजाने लगी|
हो रुपहली निशा मुस्कराने लगी|
कर रही है करिश्मा शरद पूर्णिमा,
कोष अमृत का खुलकर लुटाने लगी||

ज्योत्सना शुभ्र मन का हरण कर रही|
प्रफुल्लित अन्तःकरण कर रही|
शारदी पूर्णिमा पूर्ण यौवन भरी,
जो नवोढा सदृश आचरण कर रही||

रात तारों भरी झिलमिलाने लगी|
चन्द्र प्रियतम का दिल बहलाने लगी|
चन्द्र उपहार में चन्द्रिका देरहा|
हो मुदिल रात जिसमें नहाने लगी||

शारदी-दृश्य यूँ हो निरन्तर रहे|
कामना है लगाते रहें कहकहे|
प्यार की चाँदनी में नहाते रहें,
डर वाणी से अमृत निरन्तर बहे||

                      रचयिता- तोताराम सरस - Mo-9719907586
                      दौलतपुरी, इगलास, जि० अलीगढ़(उ० प्र०)
                      शब्द संयोजन-दि०-17-12-2024
                      (शरद पूर्णिमा)

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